Sadhana Shahi

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चंद्रशेखर आज़ाद शहीद दिवस (कहानी) प्रतियोगिता हेतु27-Feb-2024

दिनांक- 27.0 2 .2024 दिवस- मंगलवार प्रदत्त विषय- चंद्रशेखर आज़ाद शहीद दिवस

'दुश्मनों की गोलियों का सामना करेंगे, आज़ाद रहे हैं, आज़ाद रहेंगे।' यह वह वाक्य था जिसे सुनते ही अंग्रेज़ों के होश उड़ गए थे।

9 अगस्त 1925 का प्रभात था जब काकोरी लूटपाट को अंज़ाम दिया गया। इस घटना ने अंग्रेज़ों की नींव हिला दिया। उन्होंने लूटपाट में सहायक क्रांतिकारियों को गिरफ़्तार कर चार क्रांतिकारियों को फांँसी दे दिया ,4 को आजीवन कारावास दिया और लोगों को जेल की सज़ा सुनाई गई। किंतु उनमें से एक क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने अंग्रेज़ों की नाक में दम कर रखा था पुलिस उसे नहीं पकड़ पाई।

जी, हाँ मैं बात कर रही हूंँ 23 जुलाई 1906 में जन्मे पिता सीताराम केसरी और माता जगरानी देवी के पुत्र चंद्रशेखर तिवारी की जिनकी माँ उन्हें संस्कृत पढ़ा-लिखाकर विद्वान बनाना चाहती थीं। किंतु वे क्रांतिकारी बनकर भारत मांँ को आज़ाद करने में अपनी अग्रणी भूमिका निभाना चाहते थे।

आज 27 फरवरी 2024 को जब समूचा भारत जाति, धर्म, मज़हब, वर्ग, भाषा, प्रांत के भेद-भाव को भूलाकर अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद की 93वीं शहादत दिवस मना रहा है।इसी श्रृंखला में मैं भी आज उनके जीवन पर प्रकाश डालने का अपना छोटा सा प्रयास की हूँ।

ये वो शेर थे जिनका नाम सुनते ही अंग्रेज़ों के पसीने छूट जाया करते थे। 1919 में हुए जलियाँ वाले बाग हत्याकांड का पन्द्रह वर्षीय चंद्रशेखर आज़ाद तथा उनके साथियों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके परिणाम स्वरुप वे गांधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और एक विरोध प्रदर्शन में अंग्रेज़ों द्वारा गिरफ़्तार कर लिए गए। अंग्रेज़ अधिकारी ने उन्हें गिरफ़्तार करके जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया।

पूरा हाल खचाखच भरा हुआ था, जिलाधिकारी ने पंडित चंद्रशेखर तिवारी से पूछा- तुम्हारा नाम क्या है? पंडित चंद्रशेखर तिवारी ने निर्भीकता से ज़वाब दिया, आजाद। पुलिस अधिकारी उनकी हिम्मत को देखते ही रह गया और आग बबूला होते हुए पूछा- तेरे पिता का क्या नाम है ? चंद्रशेखर तिवारी ने पहले से भी अधिक हिम्मत, बहादुरी और नि:संकोच होकर ज़वाब दिया- स्वतंत्रता । अब तो अंग्रेज़ अधिकारी एकदम झल्ला गया और उसने पूछा- और तेरा घर कहांँ है? चंद्रशेखर तिवारी ने और भी अधिक हिम्मत और बहादुर से ज़वाब दिया- जेल फिर अंग्रेज़ अधिकारी ने पूछा- तो तेरा काम क्या है? चंद्रशेखर तिवारी ने कहा- अपनी भारत मांँ को किसी भी कीमत पर आज़ाद कराना।

चंद्रशेखर तिवारी के इस बेबाकी भरे उत्तरों को सुनकर मजिस्ट्रेट अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने चंद्रशेखर तिवारी को 15 कोड़े लगाने सज़ा सुनाया।

चंद्रशेखर तिवारी को एक वृक्ष में बांँध दिया गया और अंग्रेज़ी पुलिस उन पर कोड़ों की बौछार करने लगी उनको जितनी बार कोड़े लगते वो उतनी बार इंकलाब ज़िंदाबाद और भारत माता की जय का उद्घोष करते। इस घटना के पश्चात जब उन्हें रिहा किया गया। तब जेलर ने चंद्रशेखर तिवारी को 3पैसे दिया जिसे उन्होंने उसके मुँह पर फेंक दिया।

अगले दिन अख़बार में उनकी बड़ी सी फोटो निकली और इसी के बाद चंद्रशेखर तिवारी चंद्रशेखर आज़ाद कहलाए। उन्होंने ख़ुद से यह वायदा किया कि कोई भी अंग्रेज़ी अधिकारी उन्हें जीते जी नहीं पकड़ सकेगा।

1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया। काकोरी में ट्रेन लूटने के पश्चात लूटी हुई रकम को सुरक्षित लखनऊ पहुंँचाने की ज़िम्मेदारी रामप्रसाद बिस्मिल ने इन्हें दी। जिसे ये बख़ूबी निभाए और अंग्रेज़ो को चकमा देकर फरार हो गये।

जब अंग्रेज़ों ने क्रांतिकारियों को गिरफ़्तार किया तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के अख़बार प्रताप में 'भारत के नवरत्न गिरफ्तार' शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया गया। परंतु कमाल की बात यह थी कि उन नवरत्नों में चंद्रशेखर आज़ाद का नाम नहीं था।

वो पुलिस को चकमा देकर बनारस आ गए और इधर-उधर लुका- छुपी का खेल- खेलने लगे।

इसके पश्चात् सन् 1927 में ये 'बिस्मिल' से से मिले जिन्होंने आज़ाद की चपलता, बेचैनी, नए विचारों ,उत्साह, पराक्रम, जोश को देखकर उनके सम्मान में इन्हें 'क्विक सिल्वर' का उपनाम दिया।

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय अंग्रेज़ों की लाठी चार्ज में घायल होने के पश्चात मृत्यु को वरण किये। जिसके बाद राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह उनकी हत्या का बदला लेने के मंसूबे से 17 दिसंबर 1928 को लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) के पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स के दफ्तर को घेरा, राजगुरु ने उसे उसके ऊपर 6 गोलियांँ दागा जिससे सांडर्स की मृत्यु हो गई।

किंतु क्रांतिकारियों का उबलता ख़ून इतने से शांत नहीं हुआ उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया और दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम फेंकने की योजना बनाए।

1929 में भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली के अलीपुर रोड पर स्थित ब्रिटिश सरकार के असेंबली में बम फेंका और इंकलाब ज़िंदाबाद, भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए पर्चे बाँटे और स्वयं गिरफ़्तार हो गए।

एक के बाद एक इस तरह की क्रांतिकारी घटनाओं से अंग्रेज़ी पुलिस बौखला गई। और चंद्रशेखर आज़ाद को पकड़ने के लिए चप्पे-चप्पे,शहर- शहर, गली- गली में छापा मारने लगी। वह उनके घर पर भी जाकर छापा मारी।

चंद्रशेखर आजाद का परिवार टांगे से गुजर रहा था क्रांतिकारियों ने जिस संगठन का निर्माण किया था उसमें अंग्रेजों के लुटे हुए पैसे भी आते थे तथा भारतीयों से चंदा भी आता था अतः आज़ाद के साथियों ने कहा कि इसमें से कुछ पैसे घर भेज दो। इस पर चंद्रशेखर आज़ाद नाराज़गी दिखाते हुए बोले, यदि मेरा परिवार आज़ादी के आड़े आ रहा है तो मैं अपने परिवार को गोली मार दूंँगा लेकिन भारत माता के लिए इकट्ठे किए गए पैसे में अपने घर नहीं भेजूंँगा।

इसी समय चंद्रशेखर आज़ाद का उनके एक साथी से बहस हो गया था। उसी ने अंग्रेजों की मुखबिरी किया, उसने आज़ाद ही नहीं भारत माता के साथ भी गद्दारी दिखाया। उसने अंग्रेज़ों को यह बता दिया कि इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आज़ाद अपने एक साथी के साथ छुपे हुए हैं। उसी समय वहांँ पर अंग्रेज़ों की फ़ौज आ गई और चंद्रशेखर आजाद को चारों तरफ से घेर ली। चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने साथी को वहांँ से सुरक्षित बाहर निकाला और स्वयं 20 मिनट मिनट तक अंग्रेज़ी फ़ोर्स का सामना किये जब उनके पास मात्र एक गोली बची तब उन्हें अपना वायदा याद आया कि उन्हें अंग्रेज़ी पुलिस फांँसी नहीं देगी और उन्होंने अपने वायदे को निभाते हुए उस एक गोली ख़ुद को मार लिया और जाते-जाते- दुश्मनों की गोलियों का सामना करेंगे, आज़ाद रहे हैं और आज़ाद रहेंगे। का उद्घोष करते हुए अंतिम अंतिम सांँस लिए ।

आज उनकी 93 वीं पुण्यतिथि पर उस अप्रतिम साहसी,पराक्रमी, जोशीले, उत्साह से भरे हुए भारत मांँ के शेर को कोटिश:नमन।

जय- हिंद ,जय- भारत साधना शाही, वाराणसी

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4 Comments

Mohammed urooj khan

28-Feb-2024 12:47 PM

👌🏾👌🏾👌🏾

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Gunjan Kamal

28-Feb-2024 09:48 AM

शानदार प्रस्तुति

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hema mohril

28-Feb-2024 08:37 AM

Amazing

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